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25 Sep 2022

मूंग

मूंग
मूंग उत्पादन की उन्नत तकनीक

मध्यप्रदेश में मूंग ग्रीष्म एवं खरीफ दोनो मौसम की कम समय में पकने वाली एक मुख्य दलहनी फसल है। इसके दाने का प्रयोग मुख्य रूप से दाल के लिये किया जाता हैजिसमें24-26% प्रोटीन,55-60% कार्बोहाइड्रेट एवं 1.3%वसा होता है। दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ो में गठाने पाई जाती है जो कि वायुमण्डलीयनत्रजन का मृदा में स्थिरीकरण (38-40 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हैक्टयर) एवं फसल की खेत से कटाई उपरांत जड़ो एवं पत्तियो के रूप में प्रति हैक्टयर1.5टन जैविक पदार्थ भूमि में छोड़ा जाता है जिससे भूमि में जैविक कार्बन का अनुरक्षण होता है एवंमृदा की उर्वराशक्तिबढाती है। मध्यप्रदेश में मूंग की फसल हरदा, होशंगाबाद, जवलपुर, ग्वालियर, भिण्ड, मुरेना, श्योपुर एवं शिवपुरी जिले में अधिक मात्रा में उगाया जाता है।मध्यप्रदेश की औसत उत्पादकता लगभग 350किलोग्राम प्रति हैक्टयर है जो कि बहुत कम है,जिसके बढने की प्रवलसम्भावनायें है। अतः कृषक भाई उन्नत प्रजातियो एवं उत्पादन की उन्नत तकनीक को अपनाकर पैदावार को 8-10 क्विंटल प्रति हैक्टयर तक प्राप्त कर सकते है।

जलवायु-
मूंग के लिए नम एंव गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। इसकी खेती वर्षा ऋतु में की जा सकती है। इसकी वृद्धि एवं विकास के लिए 25-32 °C तापमान अनुकूल पाया गया हैं। मूंग के लिए 75-90 से.मी.वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रउपयुक्त पाये गये है। पकने के समय साफ मौसम तथा 60% आर्दता होना चाहिये। पकाव के समय अधिक वर्षा हानिप्रद होती है।
भूमि-
मूंग की खेती हेतु दोमट से बलुअरदोमटभूमियाँ जिनका पी. एच. 7.0 से 7.5 हो, इसके लिए उत्तम हैं। खेत में जल निकास उत्तम होना चाहिये।

भूमि की तैयारी-

खरीफ की फसल हेतुएक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करना चाहिए एंववर्षाप्रराम्भ होते ही 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर खरपतवार रहित करने के उपरान्त खेत में पाटा चलाकर समतल करें। दीमक से बचाव के लिये क्लोरपायरीफॉस1.5 % चूर्ण 20-25 कि.ग्रा/है. के मान से खेत की तैयारी के समय मिट्टी में मिलाना चाहिये।
ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती के लिये रबी फसलों के कटने के तुरन्त बाद खेत की तुरन्त जुताई कर 4-5 दिन छोड कर पलेवा करना चाहिए। पलेवा के बाद 2-3 जुताइयाँ देशी हल या कल्टीवेटर से कर पाटा लगाकर खेत को समतल एवं भुरभुरा बनावे। इससे उसमें नमी संरक्षित हो जाती है व बीजों से अच्छा अंकुरण मिलता हैं।

बुआई का समय -

खरीफ मूंग की बुआई का उपयुक्त समय जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई का प्रथम सप्ताह है एवं ग्रीष्मकालीन फसल को 15 मार्च तक बोनी कर देना चाहिये। बोनी में विलम्ब होने पर फूल आते समय तापक्रम वृद्धि के कारण फलियाँ कम बनती हैं अथवा बनती ही नहीं है इससे इसकी उपज प्रभावित होती है।

उन्नत किस्मो का चयन-

मँग के लिये 8 किलो नत्रजन20 किलो स्फुर, 8 किलो पोटाश एवं 8 किलो गंधक प्रति एकड़ बोने के समय प्रयोग करना चाहिये।
मध्य प्रदेश लिये उन्नत जातियों का चयन निम्नलिखित जातियों का चुनाव उनकी विशेषताओं के आधार पर करना चाहिये।

क्र.

किस्म का

नाम

अवधि

 (दिन)

उपज (क्विं/हैक्ट)

प्रमुख विशेषताये

चित्र

1

टॉम्बे जवाहर मूंग-3
(
टी.जे. एम -3)
जारी करने का वर्षः-2006
केन्द्र का नामः-जवहार लाल नेहरू कृषि विश्व विधालयजबलपुर

60-70

10-12

  • ग्रीष्म एवं खरीफ दोनो के लिए उपयुक्त

  • फलियाँगुच्छो में लगती है

  • एक फली मे8-11 दाने

  • 100 दानो का बजन3.4-4.4 ग्राम

  • पीला मोजेक एवं पाउडरीमिल्डयू रोग हेतु प्रतिरोधक

2

जवाहर मूंग -721
जारी करने का वर्षः1996
केन्द्र का नामःकृषिमहाविधालयइन्दोर

70-75

12-14

<

 

  • पूरे मध्यप्रदेश में ग्रीष्म एवं खरीफ दोनो मौसम के लिये उपयुक्त

  • पौधे की उंचाई 53-65 सेमी

  • 3-5 फलियाँ एक गुच्छे मे

  • एक फली में 10-12 दाने

  • पीला मोजेक एवं पाउडरीमिल्डयू रोग सहनशील

3

के - 851
जारी करने का वर्षः1982
केन्द्र का नामः- चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौघोगिकी विश्व विघालय, कानपुर

60-65
(ग्रीष्म)
70-80
(खरीफ)

8-10

10-12

  • ग्रीष्म एवं खरीफ दोनो मौसम के लिये उपयुक्त

  • पौधे मध्यम आकार के (60-65 सेमी.)

  • एक पौधोमे50-60 फलियाँ

  • एक फली मे10-12 दाने

  • दाना चमकीला हरा एवं बडा

  • 100 दानो का बजन4.0-4.5 ग्राम

4

एच.यू.एम. 1 (हम -1)
जारी करने का वर्षः1999
केन्द्र का नामः- बनारस हिंदू विश्वविधालय, वाराणसी

65-70

8-9

  • ग्रीष्म एवं खरीफ दोनो मौसम के लिये उपयुक्त

  • पौधे मध्यम आकार के (60-70 सेमी.)

  • एक पौधे मे40-55 फलियाँ

  • एक फली मे8-12 दाने

  • पीला मोजेक एवं पर्णदाग रोग के प्रति सहनशील

5

पी.डी.एम - 11
जारी करने का वर्षः1987
केन्द्रः-भारतीय दलहन अनुसंधान केन्द्र, कानपुर

65-75

10-12

  • ग्रीष्म एवं खरीफ दोनो मौसम के लिये उपयुक्त

  • पौधे मध्यम आकार के (55-65 सेमी.)

  • मुख्य शाखये मध्यम (3-4)

  • परिपक्व फली का आकार छोटा

  • पीला मोजेक रोग प्रतिरोधी

6

पूसा विशाल
जारी करने का वर्षः2000
केन्द्रः- भारतीय कृषि अनुसंधान केन्द्र- नई दिल्ली

60-65

12-14

  • ग्रीष्म एवं खरीफ दोनो के लिये उपयुक्त

  • पौधे मध्यम आकार के (55-70 सेमी.)

  • फली का साइज अधिक (9.5-10.5 सेमी.)

  • दाना मध्यम चमकीला हरा

  • पीला मोजेक रोग सहनशील

बीज दर व बीज उपचार-

खरीफ में कतार विधि से बुआई हेतु मूंग20 कि.ग्रा./है. पर्याप्त होता है। बसंत अथवा ग्रीष्मकालीन बुआई हेतु 25-30 कि.ग्रा/है. बीज की आवश्यकता पड़ती है। बुवाई से पूर्व बीज को कार्बेन्डाजिम + केप्टान (1 + 2) 3 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। तत्पश्चात इस उपचारित बीज को विशेष राईजोबियमकल्चर की 5 ग्राम. मात्रा प्रति किलो बीज की दर से परिश¨धित कर बोनी करें।

बुआई का तरीका -

वर्षा के मौसम में इन फसलों से अच्छा उत्पादन प्राप्तकरने हेतु हल के पीछे पंक्तियोंअथवा कतारों में बुआई करना उपयुक्त रहता है। खरीफ फसल के लिए कतार से कतार की दूरी 30-45 से.मी. तथा बसंत (ग्रीष्म) के लिये20-22.5 से.मी. रखी जाती है। पौधे से पौधे की दूरी 10-15 से.मी. रखते हुये4 से.मी. की गहराई परबोना चाहिये।

खाद एवं उर्वरक -

खाद एवं उर्वरक की मात्रा किलोग्राम /हे. होनी चाहिये।

 

नाइट्रोजन

फास्फोरस

पोटाश

गंधक

जिंक

बीज उत्पादन

20

40

20

25

20

नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाशउर्वरको की पूरी मात्रा बुबाई के समय 5-10 सेमी. गहरी कूड़ में आधार खाद के रूप में दें।

सिचाई एवं जल निकास -

प्रायः वर्षा ऋतु में मूंग की फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं पडती है फिर भी इस मौसम में एक वर्षा के बाद दूसरी वर्षा होने के बीच लम्बा अन्तराल होने पर अथवा नमी की कमी होने पर फलियाँ बनते समय एक हल्की सिंचाई आवश्यक होती है। बसंत एवं ग्रीष्म ऋतु में 10-15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। फसल पकने के 15 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर देना चाहिये। वर्षा के मौसम में अधिक वर्षा होने पर अथवा खेत में पानी का भराव होने पर फालतू पानी को खेत से निकालते रहना चाहिये, जिससे मृदा में वायु संचार बना रहता है।

खरपतवार नियंत्रण -

मूंग की फसल में नींदा नियंत्रण सही समय पर नही करने सेफसल की उपज में 40-60 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। खरीफ मौसम में फसलों में सकरी पत्ती वाले खरपतवार जैसेः सवा (इकाईनाक्लोक्लोवाकोलाकनम/ क्रुसगेली) दूब घास (साइनोडॉनडेक्टाइलोन) एवं चैडी पत्ती वाले पत्थरचटा (ट्रायन्थिमामोनोगायना), कनकवा (कोमेलिनावेंघालेंसिस), महकुआ (एजीरेटमकोनिज्वाडिस), सफेद मुर्ग (सिलोसियाअर्जेसिया), हजारदाना (फाइलेन्थसनिरूरी), एवं लहसुआ (डाइजेराआरवेंसिस) तथा मोथा (साइप्रसरोटन्डस, साइप्रसइरिया) आदि वर्ग के खरपतवार बहुतायत निकलते है। फसल व खरपतवार की प्रतिस्पर्धा की क्रान्तिक अवस्था मूंग में प्रथम 30 से 35 दिनों तक रहती है। इसलिये प्रथम निदाई-गुडाई15-20 दिनों पर तथा द्वितीय 35-40 दिन पर करना चाहियें। कतारों में ब¨ई गई फसल में व्हील ह¨ नामक यंत्र द्वारा यह कार्य आसानी से किया जा सकता है।चूंकि वर्षा के मौसम में लगातार वर्षा होने पर निदाई गुडाई हेतु समय नहीं मिल पाता साथ ही साथ श्रमिक अधिक लगने से फसल की लागत बढ जाती है। इन परिस्थितियों में नींदा नियंत्रण के लिये निम्न नींदानाशक रसायन का छिड़काव करने से भी खरपतवार का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है।खरपतवार नाशक दवाओ के छिडकाव के लिये हमेशा फ्लैट फेन नोजल का ही उपयोग करें।

शाकनाशी रसायन का नाम

मात्रा
(
ग्रा. सक्रिय पदार्थ/हे.)

प्रयोग का समय

नियंत्रित खरपतवार

पेन्डिमिथिलीन
(स्टाम्पएक्स्ट्रा)

700 ग्रा.

बुवाई के 0-3 दिन तक

घासकुल एवं कुछ चैडी पत्ती वाले खरपतवार

इमेजेथापायर
(परस्यूट)

100 ग्रा.

बुवाई के 20 दिन बाद

घासकुल, मोथाकुल एवं चैडी पत्ती वाले खरपतवार

क्यूजालोफापईथाइल (टरगासुपर)

40-50 ग्रा.

बुबाई के 15-20 दिन बाद

घासकुल के खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण

कीट नियंत्रण-

मूंग की फसल में प्रमुख रूप से फली भ्रंग, हरा फुदका, माहू, तथा कम्बल कीट का प्रकोप होता है। पत्ती भक्षक कीटों के नियंत्रण हेतु क्विनालफास की 1.5 लीटर या मोनोक्रोटोफॉस की 750 मि.ली. तथा हरा फुदका, माहू एवं सफेद मक्खी जैसे रसचूसककीटो के लिए डायमिथोएट1000 मि.ली. प्रति 600 लीटरपानी या इमिडाक्लोप्रिड17.8 एस.एल. प्रति 600 लीटर पानी में 125 मि.ली. दवा के हिसाब से प्रति हेक्टेयरछिड़काव करना लाभप्रद रहता है।

जब फलियाँ काली पड़कर पकने लगे तब तुड़ाई करना चाहिये। इन फलियों को सुखाकर बैलों के दावन से या लकड़ी द्वारा पीटकर गहाई करें।

रोग नियंत्रण -

मूंग में अधिकतर पीत रोग, पर्णदाग तथा भभूतिया रोग प्रमुखतया आते है। इन रोगों की रोकथाम हेतु रोग निरोधक किस्में हम 1, पंत मूंग1, पंतमूंग2, टी.जे.एम -3, जे.एम. 721 आदि का उपयोग करना चाहिये। पीत रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है इसके नियंत्रण हेतु मेटासिस्टॉक्स25 ईसी750 से 1000 मि.ली. का 600लीटर पानी में घोल कर प्रति हैक्टर छिड़काव 2 बार 15 दिन के अंतराल पर करे। फफूंद जनितपर्णदाग (अल्टरनेरिया/सरकोस्पोरा/माइरोथीसियस) रोगों के नियंत्रण हेतु डायइथेनएम. 45, 2.5 ग्रा/लीटर या कार्वान्डाजिम$ डायइथेनएम. 45 की मिश्रित दवा बना कर 2.0 ग्राम/लीटर पानी में घोल कर वर्षा के दिनों को छोड़ कर खुले मौसम में छिड़काव करें। आवश्यकतानुरूप छिड़काव 12-15 दिनों बाद पुनः करें।

मूंग के प्रमुख रोग एवं नियंन्त्रण

1

पीला चितकबरी (मोजेक) रोग

  • रोग प्रतिरोधी अथवा सहनशील किस्मो जैसे टी.जे.एम. -3, के -851, पन्तमूंग -2, पूसा विशाल, एच.यू.एम. -1 का चयन करे।

  • प्रमाणित एवं स्वस्थ बीजो का प्रयोग करे।

  • बीज की बुवाई जुलाई के प्रथम सप्ताह तक कतारों में करें प्रारम्भिक अवस्था में रोग ग्रसित पौधों को उखाडकर नष्ट करें।

  • यह रोग विषाणु जनित है जिसका वाहक सफेद मक्खी कीट है जिसे नियंत्रित करने के लिये ट्रायजोफॉ40 ईसी, 2 मिली प्रति लीटर अथवा थायोमेथोक्साम25 डब्लू. जी. 2 ग्राम/ली. या डायमेथोएट30 ईसी, 1 मिली./ली. पानी में घोल बनाकर 2 या 3 बार 10 दिन के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार छिडकावकरे।

2

सर्कोस्पोरापर्णदाग

  • रोग रहित स्वस्थ बीजो का प्रयोग करें।

  • खेत में पौधे घने नही होने चाहिये पौधो का 10 सेमी. की दूरी के हिसाब से विरलीकरणकरे।

  • रोग के लक्षण दिखाई देने पर मेन्कोजेब75 डब्लू. पी. की 2.5 ग्राम लीटर या कार्बेन्डाइजिम50 डब्लू. पी. की 1 ग्राम/ली. दवा का घोल बनाकर 2-3 बार छिडकावकरे।

3

एन्थ्राक्नोज

  • प्रमाणित एवं स्वस्थ बीजो का चयन करे।

  • फफूद नाशक दवा जैसे मेन्कोजेब75 डब्लू. पी. 2.5 ग्राम/ली. या कार्बेन्डाजिम50 डब्लू. पी. की 1ग्राम/ली. का छिडकावबुबाई के 40 एवं 55 दिन पश्चात करे।

4

चारकोल विगलन

  • बीजापचारकार्बेन्डाजिम50 डब्लू जी. 1 ग्राम प्रति किग्रा बीज के हिसाब से करे।

  • 2-3 वर्ष का फसल चक्र अपनाये तथा फसल चक्र में ज्वार, बाजरा फसलो को सम्मिलित करें।

5

भभूतिया (पावडरीमिल्डयू) रोग

  • रोग प्रतिरोधी किस्मो का चयन करे।

  • समय से बुबाईकरे।

  • रोग के लक्षण दिखाई देने पर कैराथन या सल्फर पाउडर 2.5 ग्राम/ली. पानी की दर से छिडकावकरे।

फसल पद्धति-

मूंग कम अवधि में तैयार होने वाली दलहनी फसल हैं जिसे फसल चक्र में सम्मलित करना लाभदायक रहता है। मक्का-आलू-गेहूँ -मूंग(बसंत),ज्वार+ मूंग -गेहूँ , अरहर + मूंग -गेहूँ , मक्का +मूंग -गेहूँ , मूंग -गेहूँ । अरहर की दो कतारों के बीच मूंग की दो कतारेअन्तः फसल के रूप में बोना चाहिये। गन्ने के साथ भी इनकी अन्तरवर्तीय खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है।

कटाई एंवगहाई-

मूंग की फसल क्रमशः 65-70दिन में पक जाती है। अर्थात जुलाई में बोई गई फसल सितम्बर तथा अक्टूबर के प्रथम सप्ताह तक कट जाती है। फरवरी-मार्च में बोई गई फसल मई में तैयार हो जाती है। फलियाँ पक कर हल्के भूरे रंग की अथवा काली होने पर कटाई योग्य हो जाती है। पौधें में फलियाँ असमान रूप से पकती हैं यदि पौधे की सभी फलियों के पकने की प्रतीक्षा की जाये तो ज्यादा पकी हुई फलियाँ चटकने लगती है अतः फलियों की तुड़ाई हरे रंग से काला रंग होते ही 2-3 बार में करें एंव बाद में फसल को पौधें के साथ काट लें। अपरिपक्वास्था में फलियों की कटाई करने से दानों की उपज एवं गुणवत्ता दोनो खराब हो जाते हैं। हॅंसिए से काटकर खेत में एक दिन सुखाने के उपरान्त खलियान में लाकर सुखाते है। सुखाने के उपरान्त डडें से पीट कर या बैंलो को चलाकर दाना अलग कर लेते है वर्तमान में मूंग एवं उड़द की थ्रेसिंग हेतु थ्रेसर का उपयोग कर गहाई कार्य किया जा सकता है।

उपज एंवभड़ारण-

मूंग की खेती उन्नत तरीके से करने पर 8-10 क्विंटल/है. औसत उपज प्राप्त की जा सकती है। मिश्रित फसल में 3-5 क्विंटल/है. उपज प्राप्त की जा सकती है। भण्ड़ारण करने से पूर्व दानों को अच्छी तरह धूप में सुखाने के उपरान्त ही जब उसमें नमी की मात्रा 8-10% रहे तभी वह भण्डारण के योग्य रहती है।

मूंग का अधिक उत्पादन लेने के लिए आवश्यक बाते -

  • श्वस्थ एवं प्रमाणित बीज का उपयोग करें।

  • सही समय पर बुवाई करें, देर से बुवाई करने पर उपज कम हो जाती है।

  • किस्मों का चयन क्षेत्रीय अनुकूलता के अनुसार करें।

  • बीजोपचार अवश्य करें जिससे पौधों को बीज एवं मृदाजनित बीमारियों से प्रारंभिक अवस्था में प्रभावित होने से बचाया जा सके।

  • मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग करे जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहती है जो टिकाऊ उत्पादन के लिए जरूरी है।

  • खरीफ मोसम में मेड नाली पध्दति से बुबाई करें।

  • समय पर खरपतवारों नियंत्रण एवं पौध संरक्षण करें जिससे रोग एवं बीमारियो का समय पर नियंत्रण किया जा सके।

 

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